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जल है तो कल है :

Posted On: 11 Aug, 2015 Others में

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मैं देखता हू कि कानपुर में ज्यादातर लोग पानी की इस तरह से बर्बादी
करते की शायद ही उन्हें भविष्य में पानी के संकट की जरा सी भी चिंता हो .
कानपुर में बहुधा लोगो ने अपने अपने घरों में सब्मर्सबल पानी वाले मोटर
पंप लगवा रखें हैं और ये लोग ही फुल स्पीड में मोटर चालू करके खूब पानी
बेवजह बहातें हैं . वैसे तो भूमिगत जल पर तो सबका एकसमान हक़ है पर ये लोग
इस जल को अपनी जागीर समझते हैं और आप इन लोगो से जल बर्बाद न करने को
भूल से भी कह दें तो ये उल्टा समझाने लगते हैं की मोटर तो हमने लगवाई
हमारी मर्जी जो करें . ये लोग पानी की कीमत जरा भी न समझे पर इस गर्मी
में पानी की एक बूँद के लिए तडपते जीव जंतु जरुर समझते जो इन लोगो के
द्वारा बर्बाद किये हुए जल जो सड़क पर फ़ैल जाता है उससे अपनी प्यास बुझाते
. ये इन्सान इतना जल बर्बाद तो कर सकते पर जरा सा भी जल अपने घरों के
बाहर नहीं रख सकते जिससे इन जीवों की प्यास बुझ सके. देश में औसत तापमान
47 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उड़ीसा,
आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र के उत्तरी इलाके बीड, नांदेड, परभणी, जालना,
औरंगाबाद, नाशिक और सतारा सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। दक्षिणी
कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में पानी के नाम पर दंगे भी हुए। कम बारिश ने
पूरे देश में भूजल स्तर घटा दिया है। आबादी का घनत्व ज्यादा है, खेती के
तरीके असंवेदनशील हैं और औद्योगीकरण बड़े स्तर पर हो रहा है। शहरीकरण व
औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार तथा
जंगलों के नष्ट होने से सब गड्ड-मड्ड हो गया है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़
का नतीजा हम नेपाल, उत्तराखंड, चीन, चिली सहित कई देशों में देख ही रहे
हैं। दुनिया के कुल क्षेत्रफल का सिर्फ 2.4% होने के बावजूद भारत में
विश्व की 18% जनसंख्या रहती है और जो वर्ष 2016 तक 1.26 अरब हो जाएगी और
अगले 35 साल में भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। ऐसे
में हर प्यासे के हलकों को तर कर पाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। शहर में
गर्मी की दस्तक के साथ ही पानी की बर्बादी भी चौक-चौराहों पर दिख जाएगी।
एक ओर बिना टोटी के नलों से रोजाना सुबह और शाम को हजारों लीटर पानी
बर्बाद हो जाता है। दूसरी ओर शहर के कई इलाकों में लोगों को पानी के लिए
इंतजार करना पड़ रहा है। पेयजल के लिए कतारें लग रही है। नगर पालिका इन
अब तक पानी की बर्बादी को रोकने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं।
लोग पानी की बर्बादी को लेकर जरा नहीं सोचते। सुबह और शाम को अपने घरों
के सामने धूल और ठंडक के लिए पानी का छिड़काव भी करते हैं, लेकिन इन
लोगों को समझाना भी मुसिबत मोल लेना है। इसी तरह शहर में लोग अपने वाहन
भी सीधे नलों से धोते हुए मिल जाएंगे। एक ओर पानी की व्यर्थ बर्बादी, तो
दूसरी ओर किल्लत के नाजारे आसानी से देखे जा सकते हैं। जल ही जीवन है
लेकिन इस शाश्वत सत्य को लोग भूलते जा रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है
वर्तमान में अंधाधुंध हो रही जल की बर्बादी। बरसाती पानी को बचाने की बात
कौन कहे लोग तो पीने योग्य पानी को भी बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। जहां
एक लोटे पानी की जरूरत है वहां लोग बाल्टी दो बाल्टी पानी यूं ही बहा दे
रहे हैं। इसे जागरूकता का अभाव कहें या फिर लापरवाही। यदि ऐसा ही चलता
रहा तो निकट भविष्य में इंसान बूंद-बूंद पानी को तरस कर रह जाएगा।
भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। जैसे-जैसे पानी पाताल की ओर भाग रहा है
पेयजल संकट तेजी से गहराता जा रहा है। अभी से शहरों में पानी को लेकर
मारामारी शुरू हो गई। वहीं गंवई क्षेत्रों में भी इसका अभाव दिखने लगा।
मई-जून की तपती दोपहरी में लोग पानी लेने के लिए हैंडपंपों पर कतारबद्ध
देखे जा सकते हैं। बाल्टी दो बाल्टी पानी के लिए कोई पांच किमी चला तो
किसी-किसी ने दस किमी की पैदल यात्रा की। गला तर करने के लिए जद्दोजहद
करने के बाद भी इंसान चेत नहीं रहा। पानी की बर्बादी कोई और नहीं बल्कि
हम और आप ही कर रहे हैं। देखा जाए तो सबसे अधिक पानी की बर्बादी वाहनों
को धोने में होती है। अनुमानत: एक वाहन की धुलाई में 50 लीटर पानी बेकार
ही नालियों में बह जाता है। धरातल पर तीन चौथाई पानी होने के बाद भी पीने
योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान
ने अंधाधुध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम कैमिकल की
भेंट चढ़ा चुके हैं, जो बचा खुचा है उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर
अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। और लोगों को पानी खर्च करने में कोई हर्ज भी
नहीं क्यूंकि अगर घर के नल में पानी नहीं आता तो वह पानी का टैंकर मंगवा
लेते हैं। सीधी सी बात है पानी की कीमत को आज भी आदमी नहीं समझ पाया है
क्यूंकि सबको लगता है आज अगर यह नहीं है तो कल तो मिल ही जाएगा।देश के हर
छोटे बड़े कस्बे, शहर और महानगरों में बने दोपहिया और चार पहिया वाहनों
के सर्विस सेन्टर और धुलाई सेंटरों में प्रतिदिन पीने योग्य पानी का जमकर
दुरूपयोग और अपव्यय वाहन धुलने जैसे महत्वहीन कार्य में खर्च होता है
लेकिन पीने के पानी की इस बड़ी बर्बादी की और चर्चा न के बराबर ही हुई
है. पर्यावरण संरक्षण और जल की समस्या को लेकर संघर्ष और आंदोलनरत
संगठनों ने अभी तक इस गंभीर मुद्दे को प्रभावशाली तरीके से उठाया ही नहीं
है. परिणामस्वरूप देश में बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से सर्विस सेंटर
व वाहन धुलाई सेंटर की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है जहां बीस से दो सौ
रुपये के लिए गाड़ी धोने के नाम पर हजारों लीटर पानी व्यर्थ में बहा दिया
जाता है. आरओ (रिवर्स आसमोसिस) सिस्टम के बूते बेशक पीने के लिए मीठे
पानी का इंतजाम हो जा रहा हो। ऐसे पानी की सप्लाई करने वाले ढेरों प्लांट
भी शहर में संचालित हैं। लेकिन मीठे पानी से प्यास बुझाने की यह कोशिश
भविष्य को कितना खारा कर रहा है, कम ही लोग जानते हैं।यूं समझ लीजिए कि
एक लीटर शुद्ध/मीठा पानी देने के लिए ये संयंत्र तीन लीटर पानी बर्बाद
करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 95 लाख लीटर पानी रोज बर्बाद हो रहा
है। जिन घरों में आरओ लगे हैं, उनमें अधिकांश लोग इससे निकलने वाले बेकार
पानी का पाइप नाली में ही डाल देते हैं। इस बेकार पानी में हानिकारक
तत्वों की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि इसे न तो बागवानी में उपयोग
किया जा सकता है और न ही सब्जी धोने में। मगर, इस पानी से घर के बर्तन
जरूर साफ किए जा सकते हैं। साथ ही घर, वाहन आदि की धुलाई आदि में प्रयोग
किया जा सकता है।गरीब लोग आज भी प्रकृति से भरपूर प्रेम करते हैं और पानी
के इस्तेमाल के किफायती तौर-तरीकों को आज भी जीवित रखे हुए हैं. इसलिए वे
जब कुएँ से जल खींचते हैं तो अपने बाल्टी-घड़े भर जाने के बाद बचे हुए
पानी को वापस कुएँ में ही डाल देते हैं, ताकि बचा हुआ पानी बर्बाद न हो
और कुआँ का पानी भी यथासंभव कम नहीं हो. लेकिन यह विवेक और यह संयम
संपन्न वर्ग में नहीं है. वे तो अपनी कार को नहलाने में, अपनी लॉन की
ऑस्ट्रेलियाई घास को सींचने में ही सैकड़ों लीटर पानी बर्बाद कर देते
हैं!
धरती पर धीरे-धीरे जलाशय का स्तर नीचे गिरता जा रहा है। आने-वाले लगभग
30-40 साल के बाद एक समय ऐसा भी आऐगा जब हमारी पीढ़ी के लिए धरती की 150
फीट की गहराई मे भी पानी की एक बुंद तक नही मिलेगी। इसलिए कहा जाता है जल
ही जीवन है, और कल जीने के लिए पानी बचाना आवशयक है। हम सबको मिलकर जल
बचाना चाहिए।पृथ्वी पर मनुष्य के लिए कितना जल उपलब्ध है? पहली नजर में,
यह एक बेकार सवाल लगता है। पृथ्वी का 72 फीसदी हिस्सा पानी है। धरती पर
उपलब्ध 97 फीसदी पानी खारा है। यह मछलियों के लिए अच्छा हो सकता है लेकिन
हमारे लिए नहीं। पानी से नमक को अलग करने की प्रौद्योगिकियां बहुत ही
महंगी हैं और किसी काम की नहीं हैं। तो सिर्फ 3 फीसदी जल बच जाता है,
जिनमें से 2.5 फीसदी अंटार्कटिक, आर्कटिक और ग्लेशियरों में जमा हुआ है।
(निश्चित रूप से ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने पर यह स्थिति बदल सकती है,
लेकिन वह एक अलग ही समस्या है) इसके बाद हमारे लिए 0.5 फीसदी बच जाता हे
और उस 0.5 फीसदी का सिर्फ सौंवां हिस्सा पृथ्वी की सतह पर झीलों, नदियों
और जलाशयों में उपलब्ध है, बाकी भूमिगत परतों में जमा है, जहां तक
पहुंचना महंगा है लेकिन इसके बावजूद उसका दोहन किया जा रहा है।
पृथ्वी काफी बड़ी जगह है, इसलिए यह सूक्ष्म अंश भी बहुत विशाल मात्रा है।
लेकिन यहां पर 7 अरब जनसंख्या है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है
कि दुनिया जल संकट की ओर बढ़ रही है। आज, तकरीबन 78 करोड़ लोगों को
स्वच्छ पेय जल नहीं मिल पाता और करीब 4000 बच्चे रोजाना गंदे पानी या
पर्याप्त स्वच्छता की कमी के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। विकसित
दुनिया के कई हिस्से भी जल संकट से जूझ रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरीका
का 56 फीसदी हिस्सा अभी सूखे से जूझ रहा है, जो अमेरीका के ज्ञात इतिहास
में अब तक के सबसे बेकार अकालों में से एक है। दुनिया की जनसंख्या बढ़ने
के साथ-साथ जल की मांग भी बढ़ेगी और वर्तमान रुझानों के मुताबिक, 2025 तक
लगभग 3 अरब लोग जल के अभाव से ग्रस्त इलाकों में रहेंगे। यूं तो दुनियाभर
में पानी को बचाने के लिये बातें हो रही हैं, प्रयास हो रहे हैं, लेकिन
यदि हम छोटे पैमाने पर पानी को सहेजने के लिये कदम उठाएं तो पानी बचा
सकते हैं। देश के प्रत्येक गांव में छोटे-छोटे तालाब बनाकर वर्षा जल को
संग्रहित कर सकते हैं, जिससे हमें खेतों में सिंचाई के लिये पानी मिलेगा
और भूमिगत जल स्तर भी सुधरेगा। शहरों में भी प्रत्येक ईमारतों की छतों
में वर्षा जल संग्रहण के लिये रेन वाटर-रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम
लगाना चाहिए। इस सिस्टम में वर्षा का जल छतों से पाइप लाइन के द्वारा
सीधे जमीन के भीतर चला जाता है। इस विधि से भू-जल स्तर में सुधार होता
है। अगर हमें भविष्य में होने वाले जल संकट को रोकना है तो इसके लिये
हमें प्रत्येक स्तर पर जल संग्रहण के प्रयास करने होंगे। जल संरक्षण के
अभियान में सभी को मिल-जुलकर जुटना होगा, प्रयास करना होगा। याद रखें जल
ही जीवन है।ऐसे बचाएं पानी-
1.व्‍यर्थ ना बहाएं- जब भी आप ब्रश करते हैं तो उस समय व्‍यर्थ ही आपके
नल से पानी बहता और बेकार होता रहता है। पानी बहुत कीमती है इसलिए जब
उसका इस्‍तमाल न करना हो तो उसे बंद ही रखें। इसी तरह नहाते वक्‍त और
किचन में बर्तन धोते वक्‍त भी पानी को ठीक से प्रयोग करें।
2. पानी कहीं लीक न हो- ज्‍यादातर लोग पानी का अपनी जरुरत से कहीं
ज्‍यादा प्रयोग कर लेते हैं, क्‍योंकि उनके नल या पाइप से पानी लीक हो
रहा होता है। अगर नल से पानी टपकता है तो उसे तुरंत बनवाइये और अगर ऐसा
नहीं कर सकते हैं तो नल के नीचे बड़ी बाल्‍टी या कटोरा लगा दीजिए और बाद
में उस पानी को यूज़ कर लीजिये।
3. लो पावर वाली वाशिंग मशीन- वाशिंग मशीन में पानी का सबसे ज्‍यादा
प्रयोग होता है। हम कपड़े धोना तो बंद नहीं कर सकते पर अगर लो पावर वाली
वाशिंग मशीन का उपयोग करें तो बिजली की बहुत बचत होगी। रोज़-रोज़ कपड़े
धोने से ज्‍यादा पानी खर्च होता है इसलिए इकठ्ठा कपड़े धोएं।
4. नाली को साफ रखें- जब भी हमारी नाली गंदी या फिर उसमें कुछ फंसा होता
है तो उस गंदगी को निकालने के लिए हम पानी का प्रयोग करते हैं। जिस वजह
से पानी बहुत ज्‍यादा खर्च होता है। इसके अलावा किचन में जो सिंक होता है
उसको साफ करना न भूलें क्‍योंकि उसमें ही सबसे ज्‍यादा गंदगी फंसती है।
5. शावर से नहीं बाल्‍टी से नहाएं- नहाते वक्‍त बाल्‍टी के पानी का
प्रयोग करें क्‍योंकि शावर से पानी ज्‍यादा खर्च होता है। इसी तरह अगर
आपके पास कार या बाइक है तो उसे धोने के लिए पाइप नहीं बल्कि बाल्‍टी का
पानी ही इस्‍तमाल करें। अपने पालतू जानवरों को गार्डन में नहलाएं, ताकि
पानी घास व पौधों को मिल सके।और एक चीज जिस पर शायद लोगों का ध्यान नहीं
जाता वो की शौचालय में जो लोग लम्बे समय तक बैठतें हैं वो उतनी देर तक नल
की टोंटी को फुल स्पीड से खुला रखतें हैं जिससे हजारों लीटर पानी एक बार
में ही बर्बाद हो जाता . कुल मिलकर आने वाले जल संकट से निपटने के लिए
इंसान को कुछ तो जागरूक होना ही होगा .

वत्सल वर्मा , (freelancer journalist cum news
correspondent/Bureau Chief) in Kanpur ( U.P.) Mob- 08542841018

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