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आजादी के असली हीरो कौन ?

Posted On: 11 Aug, 2015 Others में

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हम आजादी की ६८ सालगिरह मानाने जा रहे हैं . लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए तो अब ऐसा लगता है कि 15 अगस्त मात्र एक तारीख बनकर रह गया है। आज हमारे देश को आज़ाद हुए 68 साल हो जाएँगे पर मुझे नहीं लगता कि आज़ादी का सही मतलब अब भी हम समझ पाये हैं? जिस दिन से देश आज़ाद हुआ है तब से बिखर गए हम और तब से बिखरते ही चले गए हम, देश को आज़ाद कराने के लिए अनेकता में एकता की मिसाल कायम करने वाला भारत आज स्वयं अंदर से खोखला हो चला है। हमे हमेशा किसी न किसी ने लूटा, कभी मुग़लों ने, तो कभी अफगानियों ने, तो कभी इन अंग्रेजों ने और इसका एकमात्र कारण रहा आपसी मतभेद। जिसके चलते सभी ने हमारा फायदा उठाया। मगर फिर भी मेरा सलाम उन देश के वीरों और वीरांगनाओं को जिन्होंने इतना सब होने के बाद भी अपने साहस के बल पर अपने देश का सर किसी के सामने झुकने न दिया। आज उन्हीं वीर योद्धाओं और स्वतंत्रता सैनानियों की बदौलत हम एक आज़ाद देश में सांस ले पा रहे है। मेरी और से उन सभी महान वीर योद्धाओं और स्वतंत्रता सैनानियों को शत-शत नमन… कौन सी फिल्म कब रिलीज़ होने वाली है कौन से अभिनेता का जन्म दिन कब आता है। यह सब हर साल याद रहता हैं मगर स्वतन्त्रता संग्राम में शहीद हुए हजारों लाखों स्वतंत्रता सैनानियों का जन्मदिन या उनका शहीद दिवस कब आता है यह याद नहीं रहता। शहीद भगत सिंह जैसे करोडो लोगो ने अपनी जान हँसते हँसते हुए दे दी . वे भी किसी के भाई थे बेटे थे पति थे . पर अजीब विडम्बना है आज याकूब जैसे दरिन्दे की फांसी पर हो हल्ला हो रहा है . समझ नहीं आता याकूब जैसे लोगो के लिए हमारे देश के लोग ही दया की भीख क्यों मांगते जिनको मासूम बच्चो तक पर दया नहीं आती . अजीब विडम्बना है हमारे देश की एक तो इतने दिनों बाद न्याय मिलता ऊपर से उसमे भी इतना बवाल . जब पाकिस्तान में पेशावर में बच्चो को मारा गया 517 आतंकियों को तुरंत फांसी दे दी गयी . और एक अपने यहाँ जब सीमा पर प्रतिदिन न जाने कितने जवान मरते हैं तब शायद किसी अख़बार में या न्यूज़ चैनल में उनका नाम तक आता हो और एक तरफ हर जगह अफजल गुरु ,कसाब , याकूब . पूरी दुनिया अच्छे से जानती है की इन आतंकियों को शरण केवल पाकिस्तान ही देता है . इन आतंकियों की अपनी जान की कोई कीमत नहीं होती इन्हें तो बस लोगो को मारने में मजा आता है .और जब ऐसे लोग हमारी सरकार की पकड़ में आतें हैं तो उन पर हमारी सरकार अरबों रूपया खर्च करती .और दूसरी ओर देश की आधी आबादी भूखों मरती . यहाँ पर आतंकियों को लेकर तो नेता खूब बोलते और राजनीति करतें पर जब बेगुनाह मरते तब सब की चुप्पी सध जाती . आजादी के बाद देश में लम्बे समय तक केवल कांग्रेस की सरकारें रहीं और उन सरकारों ने अपने पालतू इतिहासकारों से केवल वही इतिहास लिखवाया, जिससे
गाँधी-नेहरू और कांग्रेस की छवि चमकती हो और उनकी गलतियाँ दबी-ढकी रहती हों। देश भर के स्कूलों में प्रारम्भ से ही यही इतिहास पढ़ाया जाता रहा है और यही दुनिया को बताया जाता रहा है। दुनिया तो वही जानेगी, जो उसे बताया जाएगा। इसलिए यदि गाँधी को संसार ने ‘महात्मा’ और ‘सत्य का पुजारी’ मान लिया तो उनकी कोई गलती नहीं है। इसी प्रकार यदि नेहरू को
संसार ने ‘शान्ति-दूत’ स्वीकार कर लिया, तो यह भी अज्ञान के कारण ही है। भारतीय संविधान के शिल्पी डा. अम्बेडकर ने अपने एक लेख में लिखा था- ”यदि किसी ऐसे पुरुष को जिसके मुँह में राम और बगल में छुरी हो, महात्मा
की उपाधि दी जा सकती है, तो गाँधी सचमुच महात्मा थे।“
इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।” यदि चरखों की आजादी की रक्षा
सम्भव होती है तो बार्डर पर टैंकों की जगह चरखे क्यों नहीं रखवा दिए जाते.
…शहीदे आज़म भगत सिंहको फांसी कि सजा सुनाई जा चुकी थी ,इसके कारन
चंद्रशेखर आज़ाद
काफी परेसान और चिंतित हो गय। भगत सिंह कि फांसी को रोकने के लिए आज़ाद ने
ब्रिटिश सरकार पर दवाब बनाने का फैसला लिया इसके लिए आज़ाद ने गांधी से
मिलने का वक्त माँगा लेकिन गांधी ने कहा कि वो किसी भी उग्रवादी से नहीं
मिल सकते। गांधी जानता था कि अगर भगत सिंह और आज़ाद जेसे क्रन्तिकारी और
ज्यादा जीवित रह गय तो वो युवाओ के हीरो बन जायेंगे। ऐसी स्थति में गांधी
को पूछने वाला कोई
ना रहता। हमने आपको कई बार बताया है कि किस तरह गांधी ने भगत सिंह को
मरवाने के लिए एक दिन
पहले फांसी दिलवाई। खैर हम फिर से आज़ाद कि व्याख्या पर आते है।
गांधी से वक्त ना मिल पाने का बाद आज़ाद ने नेहरू से मिलने का फैसला लिया
, 27 फरवरी 1931 के दिन
आज़ाद ने नेहरू से मुलाकात की। ठीक इसी दिन आज़ाद ने नेहरू के सामने भगत
सिंह कि फांसी को रोकने कि विनती की. बैठक में आज़ाद ने पूरी तैयारी के
साथ भगत सिंह
को बचाने का सफल प्लान रख दिया। जिसे देखकर नेहरू हक्का – बक्का रह गया
क्यूंकि इस प्लान के तहत भगत सिंह को आसानी से बचाया जा सकता था। नेहरू
ने आज़ाद को मदद देने से साफ़ मना कर दिया , इस पर आज़ाद नाराज हो गय और
नेहरू से जोरदार बहस हो गई फिर आज़ाद नाराज होकर अपनी साइकिल पर सवार होकर
अल्फ्रेड पार्क होकर निकल गये। पार्क में कुछ देर बैठने के बाद ही आज़ाद
को पोलिस
ने चारो तरफ से घेर लिया। पोलिस पूरी तैयारी के साथ आई थी जेसे उसे मालूम
हो कि आज़ाद पार्क में ही मौजूद है। आखरी साँस और आखरी गोली तक वो जाबांज
अंग्रेजो के हाथ नहीं लगा ,आज़ाद कि पिस्तौल में
जब तक गोलिया बाकि थी तब तक कोई अंग्रेज उनके करीब नहीं आ सका। आखिर कार आज़ाद जीवन
भरा आज़ाद ही रहा और आज़ादी में ही वीर गति प्राप्त की। अब अक्ल का अँधा भी
समझ सकता है कि नेहरु के घर से बहस करके निकल कर पार्क में १५ मिनट अंदर
भारी पोलिस बल आज़ाद को पकड़ने बिना नेहरू
कि गद्दारी के नहीं पहुच सकता। नेहरू ने पोलिस को खबर दी कि आज़ाद इस वक्त
पार्क में है और कुछ
देर वही रुकने वाला है। साथ ही कहा कि आज़ाद को जिन्दा पकड़ने कि भूल ना
करे नहीं तो भगत
सिंह कि तरफ मामला बढ़ सकता है। लेकिन फिर भी कांग्रेस कि सरकार ने नेहरू
को किताबो में बच्चो का क्रन्तिकारी चाचा नेहरू बना दिया और आज भी किताबो
में आज़ाद को “उग्रवादी” लिखा जाता है। हाल में ही सुप्रीम कोर्ट के
रिटायर्ड जज मार्केंडेय काटजू के बाद बुकर अवार्ड से सम्मानित प्रख्यात लेखिका अरुंधती राय ने महात्मा गांधी को विदेशी एजेंट करार दिया है।
अरुंधती राय ने कहा है कि गांधी विदेशों के निजी चंदे पर काम करने वाले
भारत की पहली एनजीओ थे। यही नहीं उन्होंने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है
कि लोग गांधी को पूजते हैं .अरुंधती राय ने अपने लेख में लिखा है कि
गांधी जी ने दलितों, महिलाओं और गरीबों के बारे घटिया बातें लिखी हैं।
इसके बावजूद भी गांधी को देश में पूजा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
अब आप लोगो को भी खुद निर्णय लेना होगा कि हमारी हमारी आजादी की लड़ाई के असली शहीद कौन थे ?


VATSAL VERMA (freelancer journalist cum news correspondent/Bureau Chief) in Kanpur ( U.P.) Mob- 08542841018

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