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जीने मरने की नहीं चॉइस और सब जगह ‘माइ चॉइस’ ....

Posted On: 13 Apr, 2015 Others में

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दीपिका पादुकोण और ‘माइ चॉइस’ (मेरी मर्जी) जबरदस्त सुर्खियों में है। कब
तक रहेंगे नहीं मालूम। मशहूर फैशन मैगजीन ‘वोग’ के लिए दीपिका पादुकोण की
यह शॉर्ट फिल्म अब भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में स्त्रियों की
आजादी को लेकर जबर्दस्त चर्चा का विषय बनी हुई है। करीब 2 मिनट 34
सेकेंड की इस छोटी सी डॉक्यूमेंट्री में दीपिका महिलाओं की स्वतंत्रता को
लेकर अपनी पसंद यानी ‘माइ चॉइस’ को जिस तरह से बता रही है, उससे 65 फीसदी
युवाओं की आबादी वाले इस देश में क्या संदेश जा रहा है, इस पर बहस पर
बहुत बहस हो रही है . सोशल साइट्स पर ऐसी चीजे खूब वायरल भी होती हैं .
अभी हाल में मैंने एक सोशल साइट्स पर एक किसान द्वारा आत्म्हत्या करते
हुए पोस्ट देखा पर उस पोस्ट पर शायद ही किसी ने ही कमेंट किया हो . यही
अपने देश की बड़ी विडम्बना है की बहुत लोग खासकर युवा वर्ग आज दिखावे में
जी रहा .इसे भारत देश का दुर्भाग्य ना कहें तो और क्या कहें कि औरों के
उदर की पूर्ति करने वाला ‘अन्नादाता’ किसान आज अपने ही पेट की भूख नही
मिटा पा रहा है और अपने जीवन की लीला ख़त्म करने पर आमादा है | पिछले 15
वर्षों में भारत के करीब ढाई लाख किसानो ने आत्महत्या की है | जब दिल्ली
में रेप हुआ , पेशावर में बच्चे मारे गए तब तो हर युवा मोमबत्ती लेकर
प्रदर्शन करने निकल पड़ता था पर जब आज जब हमारे किसान लाखो की संख्या में
मर रहे तब हमारे देश में किसी का खून क्यों नहीं खौल रहा . कंहा चली गयी
वो मोमबत्ती ब्रिगेड . मैं बस इन चीजो से ये बताना चाहता हूँ की जिन
किसानो के लिए जीवित रहने की चॉइस नहीं है उनके लिए ‘माय चॉइस’ तो बहुत
दूर की बात है . हम सब एक सामाजिक प्राणी हैं हम सभी को चाहे वो स्त्री
हो या मर्द सभी को सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना ही पड़ता है .दीपिका
शायद भूल गईं कि जिस तरह हर घर के अपने नियम-कायदे होते हैं, वैसे ही हर
सोसायटी के कुछ मूल्य और मर्यादाएं होती हैं। हां, हर किसी को मनमुताबिक
जीने की आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन यह आजादी स्वच्छंदता न बन जाए, यह
ध्यान रखना जरूरी है। बच्चे मां के पेट से सूट-बूट में नहीं, बिना कपड़ों
के ही पैदा होते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि बड़े होने पर भी
हम मां-बाप के सामने कपड़े उतारकर घूमें और कहें कि इन्होंने तो हमें
बचपन से ऐसे ही देखा है। कपड़े सिर्फ तन ढकने के लिए ही नहीं, बल्कि
मर्यादाओं को एक लिहाफ पहनाने के लिए भी होते हैं। उसी तरह जीवन जीने की
आजादी एक बेहतर समाज बनाने के लिए होती है, न कि आजादी और उच्छृंखलता का
फर्क मिटाने के लिए।
हमारे समाज में सेक्स को लेकर जिस तरह के टैबू हैं और स्त्री शरीर शुचिता
को लेकर जिस तरह की कंडिशनिंग है उसमें कोई स्त्री अगर सेक्शुअल आजादी की
बात करें तो लोगों की नजरें टेढ़ी हो ही जाती हैं। ऐसे में सवाल यह भी है
कि क्या स्त्री इन सब डर की वजह से सेक्स का आनंद लेने के अपने अधिकार पर
दावा छोड़ दे और यह भी कि तमाम खतरे उठाते हुए अपनी देह पर अपना अधिकार
सुनिश्चित कर लेने से, यानी देह मुक्ति हासिल कर लेने से क्या वाकई उसकी
जिंदगी मुक्त हो जाएगी? उसके लिए जीवन के सारे फैसले आसान हो जाएंगे?जब
तक स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती और धर्म की बेड़ियों से खुद
को मुक्त नहीं करती, तब तक मात्र देह की आजादी से उसको खास कुछ हासिल
नहीं होगा। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुए बिना और धर्म की गुलामी से
मुक्ति पाए बिना किसी तरह की मुक्ति या चॉइस की बात करना बेमानी
है।
अब जरा गौर करते हैं दीपिका की मर्जी पर

1. मैं साइज जीरो रहूं या साइज 15… मेरी मर्जी
इंसान मोटा हो या पतला, यह बेशक उसकी अपनी चॉइस होनी चाहिए। हालांकि
जरूरत से ज्यादा मोटे होने पर आपके अपने कहेंगे कि अगर थोड़े पतले होते
तो अच्छा था। इसी तरह स्लिम ट्रिम और पतली दिखने की चाहत में अगर कोई
एनोरेक्सिया की मरीज बन जाए तो उसे टोका जाना कहां गलत है। अब इस बीमारी
को अगर कोई अपनी मर्जी कहने लगे तो उसे कैसे सही ठहराएगा जाएगा।

2. शादी करूं या ना करूं, शादी से पहले सेक्स करूं या शादी से बाहर संबंध
बनाऊं… मेरी मर्जी
शादी न करने के फैसले को हम व्यक्तिगत मान सकते हैं (हालांकि पैरंट्स को
बच्चों खासकर बेटी की शादी से बड़ी चिंता नहीं होती), लेकिन शादी से पहले
सेक्स करने या फिर शादी से बाहर सेक्स करने को हिंदुस्तानी समाज में
व्यभिचार, अडल्ट्री या नाजायज रिश्ता ही कहा जाता है। फिर इस तरह के
रिश्तों में शारीरिक और मानसिक, दोनों समस्याएं महिलाओं को ज्यादा झेलनी
पड़ती हैं। जरा सोचिए, दीपिका की इस बात को सशक्तीकरण माना जा रहा है,
जबकि यही बात कोई पुरुष कहता तो उसे तमाम गालियां पड़तीं। ऐसा नहीं है कि
यह बंधन महिलाओं के लिए ही है, हमारे समाज में इस मामले में खुली छूट
पुरुषों को भी नहीं है।

3. मैं घर जब आऊं, सुबह 4 बजे आऊं या शाम 6 बजे… मेरी मर्जी
आजादी और बराबरी का मतलब यह कतई नहीं है कि आप सिर्फ अपने ही बारे में ही
सोचें। किसी औरत के देर से घर आने पर सवाल उसकी फिक्र के लिए भी हो सकता
है। जरा इसी बात को उलट कर देखें, अगर घर का बेटा, पिता या पति देर तक घर
नहीं लौटता है तो क्या उस घर की औरत उससे सवाल नहीं करती है? इस तरह की
सोच के साथ अकेले तो रहा जा सकता है, लेकिन घर-परिवार के साथ निभाना
मुश्किल है।

4. बच्चा करूं या न करूं… मेरी मर्जी …
भारतीय समाज में बच्चा आज भी शादी के नतीजे के तौर पर ही स्वीकार्य है।
ऐसे में कोई औरत अगर यह कहे कि मैं बच्चा अपनी पसंद के आदमी से पैदा
करूंगी तो उसकी दिमागी हालत के अलावा चरित्र पर भी सवाल उठने लगेंगे। यह
सच है कि बच्चा पैदा करने का प्रेशर किसी महिला पर नहीं होना चाहिए,
लेकिन अगर सभी महिलाएं बच्चा पैदा न करने की सोचने लगें तो दुनिया का
संतुलन पूरी तरह गड़बड़ा जाएगा।

विडियो वाले इन सशक्तीकरण अभियानों से अलग हटकर देखें तो अपने देश में
रमाबाई, सावित्री बाई फुले जैसी स्त्रियां हुई हैं जिन्होंने लीक तोड़ी,
तमाम संघर्ष किए, समाज की सोच को बदला, खुद मुक्त हुईं और दूसरी तमाम
स्त्रियों का जीवन संवारा। जब स्त्री समाज द्वारा थोपी अन्य तमाम दासताओं
को चुनौती देती हुई आगे बढ़ती है तो उसी क्रम में देह मुक्ति की मंजिल को
भी पार कर जाती है।

from वत्सल वर्मा ….from VATSAL VERMA
(freelancer journalist cum news
correspondent/Bureau Chief) Mob- 8542841018

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