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इंट्रोडक्शन के नाम पर रैगिंग .....नाम बदला पर रिश्ता वही ...

Posted On: 7 Apr, 2015 Others में

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रैगिंग का मतलब गुंडागर्दी है।रैगिंग, यह शब्द पढ़ने में सामान्य लगता
है। इसके पीछे छिपी भयावहता को वे ही छात्र समझ सकते हैं जो इसके शिकार
हुए हैं। आधुनिकता के साथ रैगिंग के तरीके भी बदलते जा रहे हैं। रैगिंग
आमतौर पर सीनियर विद्यार्थी द्वारा कॉलेज में आए नए विद्यार्थी से परिचय
लेने की प्रक्रिया। कॉलेज आने वाला हर विद्यार्थी 18 वर्ष से अधिकके
होते हैं। जब उन्हें वोट डालकर देश की सरकार चुनने का अधिकार होता है तो
फिर उन्हें किसी तरह के संस्कार या अनुशासन सिखाने की जिम्मेदारी किसी
दूसरे छात्र की नहीं हो सकती। इसलिए आप लोग इंट्रोडक्शन के नाम पर जो
रैगिंग लेते हैं, वह सरासर गलत है। रैगिंग का नाम सुनते ही फ्रेशर
स्टूडेंट्स के मन में एक डर बैठ जाता है। कई स्टूडेंेट्स तो पहले दिन
कॉलेज जाते हुए भी डरने हैं। खूबसूरत भविष्य की तलाश में घर-परिवार
छोड़कर बड़े शहरों के बड़े कॉलेजों में एडमिशन लेने और फिर हॉस्टल की
दुनिया में अपनी नई पहचान तलाशने की कोशिश करने वाले स्टूडेंट्स पर कई
बार अजीबो गरीब इट्रोडक्शन का सामना करना पड़ता है। रैगिंग के खिलाफ
कानून और मैनेजमेंट की तमाम सख्ती के बावजूद कॉलेज कैम्पस खासकर हॉस्टल
लाइफ में इट्रोडक्शन नाम का विलेन खत्म नहीं हो पाया है।
रैगिंग के नाम पर नए स्टूडेंट को न सिर्फ परेशान किया जाता है, बल्कि
उनकेे साथ बदतमीजी तक कर दी जाती है। यही कारण है कि हर साल कोई न कोई
अनहोनी घटना सामने आ रही है। प्रफेशनल कॉलेजों में रैगिंग ज्यादा होती है
. सीनियर छात्र कक्षाओं में आकर उनके नाम-पते पूछते हैं, फिर गाना गाने व
डांस करने को कहते हैं। रैगिंग को किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा
सकता ह. कॉलेज में जहाँ छात्रों का भविष्य बनता है उस जगह पर किसी तरह का
हँसी-मज़ाक़ या हलकापन बरदाश्त नहीं करना चाहिए. सीनियर और जूनियर के
मेल-मिलाप के कई और तरीक़े हैं रैगिंग के अलावा.
रैगिंग एक मानसिक बीमारी का नाम है जो छात्रों में अपराध व प्रतिशोध की
भावना को जन्म देती है.रैगिंग(परिचय) के नाम पर पुराने छात्र-छात्राएं नए
छात्र-छात्राओं को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित करते हैं कि
वह आत्महत्या तक कर लेता है,बहुत से पढ़ाई छोड़ देते है,कुछ तुरंत बदला
लेते हैं और शेष आगामी नए छात्रों से अपनी भड़ास निकालते हैं,इसतरह यह
सिलसिला चलता रहता है.इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए तथा छात्रों का ‘परिचय’
कालेज प्रशासन की देख-रेख में कुछ निश्चित दिनों में ही होना
चाहिए.रैगिंग जैसी कुप्रथा को किसी भी सभ्‍य समाज में जायज नहीं ठहराया
जा सकता। शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता को बनाए रखना है तो इसे सख्ती से
रोकना होगा। वैसे तो कॉलेज खुलने के समय नए विद्यार्थियों को प्रवेश
मिलने की खुशियां मनानी चाहिए। लेकिन उन्हें कॉलेज के सीनियर छात्रों के
कठोर व्यवहार को सहना पड़ता है। ऐसे बहुत कम छात्र होते हैं, जो रैंगिंग
के खिलाफ लड़ते हैं। अनगिनत छात्र ऐसे हैं, जो चुपचाप इसे सहते हैं, और
पूरे जीवन पीड़ा का अनुभव करते हैं। रैगिंग से मौत होने पर ही इसके खिलाफ
आवाज़ उठाई जाती है। लेकिन कुछ दिनों बाद फिर सब कुछ शांत हो जाता
है।रैगिंग को नियंत्रित करने के लिए हमें नए कानूनों की आवश्यकता है। एक
देश के तौर पर हम अव्यवस्थित तरीके से चल रहे हैं, पर जब कोई गुंडागर्दी
होती है तो नए कानून बनाने की बात करते हैं। रैगिंग रोकने के लिए नए
कानून बनाने की बात अपने आप में एक दुखद मजाक की तरह ही लगती है। नए
कानूनों से ऐसे छात्रों को दंड दिलाना ज़रूर आसान हो जाएगा। लेकिन ऐसी
क्रूरता से निपटने के लिए मौजूदा कानून ही अपने आप में काफी हैं। इन
कानूनों को हर स्तर पर कड़ाई से लागू करने की ज़रूरत है। अगर कानूनों को
लागू करने में ढिलाई होगी, तो नए कानून बनानें से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
हिंसा की ऐसी वारदातों को रोकने के लिए शिक्षण संस्थानों को अपने यहां
कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। ऐसा करने के लिए सरकार और समाज को संस्थानों पर
दबाव बनाना पड़ेगा।हमारा प्रशासन और समाज भी ऐसी घटनाओं को रोकने में
दिलचस्पी नहीं लेता। रैगिंग की परंपरा पश्चिमी देशों में शुरू हुई थी। उन
देशों में सेना के जवानों के बीच रैगिंग का रिवाज था। लेकिन आज कॉलेजों
में रैगिंग का कोई मतलब नहीं बनता। नए छात्रों को अपमानित करने की परंपरा
हमारे संस्कृति के लोकाचार के भी खिलाफ है, क्योंकि हमारी संस्कृति तो
‘अतिथि देवो भव’ की वकालत करती है। नए छात्रों का विश्वास पाने की जगह
सीनियर सहपाठी नए आने वाले छात्रों के दुश्मन बन जाते हैं। यह हमारे
मूल्यों में एक घिनौनी गिरावट है। हर सभ्य संस्कृति की तरह ही हमारी
संस्कृति में भी अपने से उम्र में छोटों को पहली प्राथमिकता दी जाती है।
लेकिन, जो छात्र कहीं एक दिन पहले आ जाता है, वह खुद को ‘सीनियर’ समझने
लगता है। उसे लगता है कि उसे अपने से ‘जूनियर’ को उसकी हैसियत बताकर रखनी
है।यह आधुनिक मानवता के लिए एक शाप की तरह है। रैगिंग के चलते कितनी
जिंदगियां तबाह हुईं और कितने होनहार छात्रों का भविष्य चौपट हो गया, यह
किसी से छिपा नहीं है। रैगिंग के नाम पर जिस तरह की शर्मनाक घटनाएं इन
कालेजों में होती हैं, वे किसी को भी सदमे का शिकार बना देने के लिए काफी
होती हैं। कहीं कपड़े उतरवाना तो कहीं मुर्गा बनाना, कहीं बेवजह दौड़
लगवाना और कहीं उलटी-सीधी हरकतें करना.. यह सब रैगिंग में शामिल हो चुका
है। हालात यह हैं कि आम तौर पर इनके शिकार छात्र कालेज प्रशासन और अपने
परिजनों को ऐसी हरकतों के बारे में बताते हुए भी शर्माते हैं। दूसरी तरफ,
अराजक तत्वों का मनोबल इससे बढ़ता ही चला जाता है। वे सीधे-सादे नए
छात्रों की शर्मिंदगी का गलत फायदा उठाते हैं और लगातार अपनी बेजा हरकतें
बढ़ाते ही चले जाते हैं। पता तब चलता है जब स्थितियां विस्फोटक स्तर तक
पहुंच जाती हैं। रैगिंग की समस्या आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो रही है
ऐसा कहा जाएगा तो गलत नहीं होगा। क्योंकि रैगिंग करने वाले आतंकवादियों
से भी ज्यादा बर्बर व्यवहार करते हैं उन बच्चों के साथ, जो आते हैं
कॅालेज की दुनिया में कई सपने लेकर। नतीजा यह होता है कि पीड़ित इससे तंग
होकर अंतत: मौत के आगोश में चले जाते हैं।

वत्सल वर्मा

VATSAL VERMA (freelancer journalist cum news correspondent/Bureau
Chief) in Kanpur ( U.P.) Mob- 08542841018

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