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आत्माओं का सच ...........

Posted On: 7 Apr, 2015 Others में

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कहते हैं आदमी के शरीर में उसकी आत्‍मा का वास होता है और जब व्‍यक्ति की
मौत होती है तो आत्‍माएं शरीर छोड़ कर चली जाती हैं, एक नए जीवन में
प्रवेश करने के लिए। ये चक्र कई जन्‍मों तक चलता रहता है। मान्‍यता ये भी
है कि अगर किसी की अकाल मौत (दुर्घटना में मृत्‍यु, हत्‍या आदि) हो जाए
तो आत्‍माएं भटकती रहती हैं। हालांकि आत्‍माओं के अस्तित्‍व पर सवाल भी
उठे हैं। बहुत सारे लोग हैं, जो इन सब बातों पर बिल्‍कुल भी विश्‍वास
नहीं करते। उनका मानना है कि जिस जीवन को हम देखते हैं, वही सब कुछ है।
भूत, प्रेत व आत्‍मा जैसी कोई चीज नहीं। ये सब शब्‍द मनुष्‍यों ने ही कुछ
खास कारणों और निजी लाभों से गढ़े हैं।
हिंदू धर्म में मरने के बाद मृत शरीर का दाह संस्कार किए जाने के बाद ही
उसे मुक्ति या मोक्ष की प्राप्ति होती है. अगर किसी भी वजह से उस शरीर का
पूरे विधि-विधान के साथ संस्कार ना किया जाए तो शरीर को छोड़ने के बाद भी
आत्मा को दुनिया से मुक्ति नहीं मिलती और वह भटकती रहती है.
कुछ लोग मानते हैं कि आत्माएं सच में आती हैं पर कुछ लोगों को यह सब
बातें बकवास लगती हैं. पर आज यह बात सुनकर आपको हैरानी होगी कि सच में
आत्माएं आती हैं और आत्माओं के आने के कारण कई हादसे भी होते हैं. क्या
सच में आत्माओं का काम लोगों को दुख देना होता है या फिर आत्माएं सिर्फ
अपना अहसास कराने के लिए आती हैं? कुछ आत्माएं लोगों को दुख देती हैं पर
कुछ आत्माएं लोगों की सहायता भी करती हैं.यह एक रहस्य ही है कि मौत के
बाद की दुनिया कैसी है। शरीर छोडऩे के बाद आत्मा कहां जाती है और क्या इस
दुनिया के अलावा भी कोई दुनिया है जहां इंसान को मृत्यु के बाद कर्मफल
भोगने पड़ते हैं। किस्से कहानियों में नर्क की यातनाएं और स्वर्ग के
सुखों के बारे में जो सुना है वह कितना सच है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा की यात्रा अनंत है और यह
शरीर केवल इसके लिए एक साधन है। बिलकुल कपड़े की तरह। आत्मा जब एक शरीर
छोड़ती है, तो फिर कहीं ओर वह दूसरा शरीर भी धारण करती है। ये बात
भलीभांति सुनी और समझी हुई है लेकिन एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा
में आत्मा को किन-किन घटनाओं से गुजरना पड़ता है, यह सबसे अधिक रोमांच और
जिज्ञासा का विषय है।
हिंदू धर्म ग्रंथों में आत्मा की अनंत यात्रा का विवरण कई तरह से मिलता
है। भागवत पुराण, महाभारत, गरूड़ पुराण, कठोपनिषद, विष्णु पुराण,
अग्रिपुराण जैसे ग्रंथों में इन बातों का बहुत जानकारी परक विवरण मिलता
है। गरूड़ पुराण कहता है कि जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो उसे दो यमदूत
लेने आते हैं। जैसे हमारे कर्म होते हैं उसी तरह वो हमें ले जाते हैं।
अगर मरने वाला सज्जन है, पुण्यात्मा है तो उसके प्राण निकलने में कोई
पीड़ा नहीं होती है लेकिन अगर वो दुराचारी या पापी हो तो उसे बहुत तरह से
पीड़ा सहनी पड़ती है। पुण्यात्मा को सम्मान से और दुरात्मा को दंड देते
हुए ले जाया जाता है। गरूड़ पुराण में यह उल्लेख भी मिलता है कि मृत्यु
के बाद आत्मा को यमदूत केवल 24 घंटों के लिए ही ले जाते हैं।
इन 24 घंटों में उसे पूरे जन्म की घटनाओं में ले जाया जाता है। उसे
दिखाया जाता है कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किए हैं। इसके बाद
आत्मा को फिर उसी घर में छोड़ दिया जाता है जहां उसने शरीर का त्याग किया
था। इसके बाद 13 दिन के उत्तर कार्यों तक वह वहीं रहता है। 13 दिन बाद वह
फिर यमलोक की यात्रा करता है।
वेदों, गरूड़ पुराण और कुछ उपनिषदों के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की आठ
तरह की दशा होती है, जिसे गति भी कहते हैं। इसे मूलत: दो भागों में बांटा
जाता है पहला अगति और दूसरा गति। अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता
है उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है। गति में जीव को किसी लोक में जाना
पड़ता है।

अगति के चार प्रकार हैं क्षिणोदर्क, भूमोदर्क, तृतीय अगति और चतुर्थ
अगति। क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक
में आता है और संतों सा जीवन जीता है, भूमोदर्क में वह सुखी और
ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है, तृतीय अगति में नीच या पशु जीवन और चतुर्थ गति
में वह कीट, कीड़ों जैसा जीवन पाता है। वहीं गति के अंतर्गत चार लोक दिए
गए हैं और जीव अपने कर्मों के अनुसार गति के चार लोकों ब्रह्मलोक,
देवलोक, पितृ लोक और नर्क लोक में स्थान पाता है। आत्मा की यात्रा का
मार्ग पुराणों में आत्मा की यात्रा के तीन मार्ग माने गए हैं। जब भी कोई
मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा
प्रारंभ करती है तो उसे तीन मार्ग मिलते हैं। उसके कर्मों के अनुसार उसे
कोई एक मार्ग यात्रा के लिए दिया जाता है।
ये तीन मार्ग है अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि
मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए है। धूममार्ग पितृलोक की
यात्रा के लिए है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है।मौत
और मौत के बाद की दुनिया की जितनी भी कल्पना की जाए उसका सही अनुमान
लगाना काफी मुश्किल है। मरने के बाद क्या वाकई कोई यमपुरी है जहां आत्मा
को ले जाया जाता है? या फिर आत्मा को खुद ही वहां पहुंचना होता है। उसका
रास्ता कैसा है? यमपुरी या यमलोक जैसी कोई दुनिया है? या यह केवल कपोल
कल्पना मात्र है।
यमपुरी का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है। जिसमें गरूड़ पुराण,
कठोपनिषद, आदि में इसका विस्तृत विवरण मिलता है। मृत्यु के 12 दिन बाद
आत्मा यमलोक का सफर शुरू करती है। इन बारह दिनों में वह अपने पुत्रों और
रिश्तेदारों द्वारा किए गए पिंड दान के पिंड खाकर शक्ति प्राप्त करती है।
बारह दिन बाद सारे उत्तर कार्य खत्म होने पर आत्मा यमलोक के लिए यात्रा
को निकलती है। इसे मृत्युलोक यानी पृथ्वी से 86000 योजन दूरी पर माना
गया है। एक योजन में करीब 4 किमी की दूरी होती है
यमलोक के इस रास्ते में वैतरणी नदी का उल्लेख भी मिलता है। यह नदी बहुत
भयंकर है, यह विष्ठा और रक्त से भरी हुई है। इसमें मांस का कीचड़ होता
है। अपने जीवन में दान न करने वाले मनुष्य मृत्यु के बाद यमपुरी की
यात्रा के समय इस नदी में डूबते हैं और बाद में यमदूतों द्वारा निकाले
जाते हैं।
यमपुरी का रास्ता बहुत लंबा है, आत्मा सत्रह दिन तक यात्रा करके 18वें
दिन यमपुरी पहुंचती है। यमपुरी में भी एक नदी का वर्णन मिलता है, जिसमें
स्वच्छ पानी बहता है, कमल के फूल खिले रहते हैं। इस नदी का नाम है
पुष्पोदका।
इसी नदी के किनारे एक वटवृछ है जहां आत्मा थोड़ी देर विश्राम करती है। तब
तक उसे शरीर त्यागे पूरा एक महीना बीत चुका होता है और इसी वटवृक्ष के
नीचे बैठकर वह जीव पुत्रों द्वारा किए गए मासिक पिंडदान के पिंड को खाता
है। फिर कुछ नगरों को लांघकर यमराज के सामने पहुंची है। वहां से आत्मा को
उसके कर्मों के अनुसार दंड या सम्मान मिलता है। यम लोक एक लाख योजन
क्षेत्र में फैला माना गया है। इसके चार मुख्य द्वार हैं। पूर्व द्वार
योगियों, ऋषियों, सिद्धों, यक्षों, गंधर्वों के लिए होता है। यह द्वार
हीरे, मोती, नीलम और पुखराज जैसे रत्नों से सजा होता है। यहां गंधर्वों
के गीत और अप्सराओं के नृत्य से जीवात्माओं का स्वागत किया जाता है। इसके
बाद दूसरा महत्वपूर्ण द्वार है उत्तर द्वार जिसमें विभिन्न रत्न जड़े
हैं, यहां वीणा और मृदंग से मंगलगान होता है। यहां दानी, तपी, सत्यवादी,
माता,पिता और ब्राह्मणों की सेवा करने वाले लोग आते हैं।
पश्चिम द्वार भी रत्नों से सजा है और यहां भी मंगल गान से जीवों का
स्वागत होता है। यहां ऐसे जीवों को प्रवेश मिलता है जिन्होंने तीर्थों
में प्राण त्यागे हों या फिर गौ, मित्र, परिवार स्वामी या राष्ट्र की
रक्षा में प्राण त्यागे हो। यमपुरी का दक्षिण द्वार सबसे ज्यादा भयानक
माना जाता है। यहां हमेशा घोर अंधेरा रहता है। द्वार पर विषैले सांप,
बिरूछु, सिंह, भेडि़ए आदि खतरनाक जीव होते हैं जो हर आने वाले को घायल
करते हैं। यहां सारे पापियों को प्रवेश मिलता है।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार जीव को बार-बार जन्म लेना पड़ता है।
अपने पिछले जन्म के कर्मों का फल तो वह नर्क की यातनाओं से भोगता है और
कुछ उसे अपने अगले जन्म में भोगना पड़ते हैं। इस बारे में ज्योतिष
शास्त्र का अपना अलग मत है। गरूड़ पुराण के अनुसार जीव पहला शरीर छोडऩे
के बाद पहले अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है। उसे तरह-तरह की यातनाएं
दी जाती हैं। कई वर्षों तक नारकीय यातनाओं के बाद उसे फिर जन्म दिया जाता
है।
वह अपने कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग भी पाता है। यहां स्वर्ग की भी कई
श्रेणियां मानी गई हैं। जिसमें से मध्यम श्रेणी के स्वर्ग का अधिपति
इंद्र को माना गया है। इससे भी ऊंचे स्वर्ग माने गए हैं। अच्छे कर्मों के
कारण जीवों को यहां सुख भोगने को मिलता है। सुख भोगने के बाद भी उसकी
अवधि समाप्त होने पर उस जीव को दोबारा जन्म लेना पड़ता है।
वहीं ज्योतिष शास्त्र का विचार थोड़ा ज्यादा तर्कसंगत और वैज्ञानिक है।
ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि कोई भी जीव दूसरा जन्म तब लेता है
जब उसके पूर्व जन्म के कर्मफल के अनुसार ग्रह दशाएं बनती हैं। तब वह जीव
अपनी माता के गर्भ में आता है और फिर वैसे ही मिलते-जुलते ग्रह नक्षत्रों
में वह जन्म भी लेता है। इसकी कोई अवधि निश्चित नहीं होती है। इसमें
सदियां भी लग सकती हैं।
सामान्य व्यक्ति जैसे ही शरीर छोड़ता है, सर्वप्रथम तो उसकी आंखों के
सामने गहरा अंधेरा छा जाता है, जहां उसे कुछ भी अनुभव नहीं होता। कुछ समय
तक कुछ आवाजें सुनाई देती है कुछ दृश्य दिखाई देते हैं जैसा कि स्वप्न
में होता है और फिर धीरे-धीरे वह गहरी सुषुप्ति में खो जाता है, जैसे कोई
कोमा में चला जाता है।
गहरी सुषुप्ति में कुछ लोग अनंतकाल के लिए खो जाते हैं, तो कुछ इस अवस्था
में ही किसी दूसरे गर्भ में जन्म ले लेते हैं। प्रकृ‍ति उन्हें उनके भाव,
विचार और जागरण की अवस्था अनुसार गर्भ उपलब्ध करा देती है। जिसकी जैसी
योग्यता वैसा गर्भ या जिसकी जैसी गति वैसी सुगति या दुर्गति। गति का
संबंध मति से होता है। सुमति तो सुगति।
लेकिन यदि व्यक्ति स्मृतिवान (चाहे अच्छा हो या बुरा) है तो सु‍षुप्ति
में जागकर चीजों को समझने का प्रयास करता है। फिर भी वह जाग्रत और स्वप्न
अवस्था में भेद नहीं कर पाता है। वह कुछ-कुछ जागा हुआ और कुछ-कुछ सोया
हुआ सा रहता है, लेकिन उसे उसके मरने की खबर रहती है। ऐसा व्यक्ति तब तक
जन्म नहीं ले सकता जब तक की उसकी इस जन्म की स्मृतियों का नाश नहीं हो
जाता। कुछ अपवाद स्वरूप जन्म ले लेते हैं जिन्हें पूर्व जन्म का ज्ञान हो
जाता है। ऐसा माना जाता है कि मानव शरीर नश्वर है, जिसने जन्म लिया है
उसे एक ना एक दिन अपने प्राण त्यागने ही पड़ते हैं. भले ही मनुष्य या कोई
अन्य जीवित प्राणी सौ वर्ष या उससे भी अधिक क्यों ना जी ले लेकिन अंत में
उसे अपना शरीर छोड़कर वापस परमात्मा की शरण में जाना ही होता है. यद्यपि
इस सच से हम सभी भली-भांति परिचित हैं लेकिन मृत्यु के पश्चात जब शव को
अंतिम विदाई दे दी जाती है तो ऐसे में आत्मा का क्या होता है यह बात अभी
तक कोई नहीं समझ पाया है. एक बार अपने शरीर को त्यागने के बाद वापस उस
शरीर में प्रदार्पित होना असंभव है इसीलिए मौत के बाद की दुनियां कैसी है
यह अभी तक एक रहस्य ही बना हुआ है.
किस्से-कहानियों या फिर अफवाहों में तो मौत के पश्चात आत्मा को मिलने
वाली यात्नाएं या फिर विशेष सुविधाओं के बारे में तो कई बार सुना जा चुका
है लेकिन पुख्ता तौर पर अभी तक कोई यह नहीं जान पाया है कि क्या वास्तव
में इस दुनियां के बाद भी एक ऐसी दुनियां है जहां आत्मा को संरक्षित कर
रखा जाता है अगर नहीं तो जीवन का अंत हो जाने पर आत्मा कहां चली जाती
है?मृत्यु के पश्चात क्या होता है? मृत्यु के अनुभव के बारे में कोई किस
प्रकार बता सकता है? मृत व्यक्ति अपना अनुभव नहीं बता सकता, जिनका जन्म
हुआ है उन्हें अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ याद नहीं, कोई नहीं जानता
कि जन्म से पहले और मृत्यु के बाद में क्या होता है।
पुराने किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और
संयोग होता है। ऐसी कोई जगह जहां मौत का साया बनकर रूहें घुमती हो उन
जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है और एक अजीब दुनिया के
सामने जिसके बारें में उसे कोई अंदाजा नहीं होता है, अपने घुटने टेक देता
है। दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत
है और वहां आज भी रूहों का वास है।

दुनिया में ऐसी जगहों के बारें में लोग जानते है, लेकिन बहुत कम ही लोग
होते हैं, जो इनसे रूबरू होने की हिम्‍मत रखतें है। जैसे हम दुनिया में
अपने होने या ना होने की बात पर विश्‍वास करतें हैं वैसे ही हमारे दिमाग
के एक कोने में इन रूहों की दुनिया के होने का भी आभास होता है। ये दीगर
बात है कि कई लोग दुनिया के सामने इस मानने से इनकार करते हों, लेकिन
अपने तर्कों से आप सिर्फ अपने दिल को तसल्‍ली दे सकते हैं, दुनिया की
हकीकत को नहीं बदल सकते है।
दुनिया में बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां रूहों का वास होता है। रूहें,
आत्‍माएं या फिर बुरी शक्तियां शुरू से ही इंसानी दिमाग के लिए एक
क्‍वीदंती ही बनी रही हैं। कभी-कभी कुछ लोगों ने इन्‍हे महसूस किया है और
अपने राय दूसरों को दिए हैं, लेकिन इंसानी स्‍वभाव या तो बहुत जल्‍दी ही
किसी बात को मान लेता है या तो किसी डर की वजह से जिंदगी भर एक हकीकत से
मूंह मोडे़ रहता है।

रूहों के बारे में एक बात बहुत से लोग जानना चाहतें है कि, आखिर ये रूहें
या फिर आत्‍माएं कहां से आती हैं? या फिर इनका जन्‍म या निर्माण कैसे
होता है? आपको बता दें कि इनका
जन्‍म किसी जीव की मौत के बाद ही होता है। दुनिया में कई तरह की मौतें
होती है जैसे कि, बिमारी से मौत, हत्‍या, आत्‍महत्‍या, हादसों से मौत या
फिर एक सामान्‍य उम्र गुजरने के
बाद मौत। लेकिन इन सारी मौतों में जो मौत सबसे अलग होती है वो है
सामान्‍य उम्र गुजारने के बाद होने वाली मौत।

जो भी जीव इस पृथ्‍वी पर जन्‍म लेता है उसकी मृत्‍यु भी तय होती है यहां
तक माना जाता है कि जीव अपने जन्‍म के साथ अपने मौत का समय और जरीया भी
साथ ही लाता है। लेकिन कभी कभी वो जीव अपने मौत के समय से पूर्व ही काल
के गाल में समा जाता है जो कि अकाल मृत्‍यु कही जाती है। इंसानी जान पर
केवल उसके भाग्‍य का ही अधिकार नहीं होता है अपितु उसके आस-पास के लोगों
का भाग्‍य या वातावरण भी उसकी किस्‍मत और जीवन-मौत का फैसला कर देते हैं।

यही अकाल मृत्‍यु जोकि समय के पूर्व किसी जीव की हो जाती है तो उसे अपनी
आयु पूरी करनी पड़ती है। अपनी आयु पूरी करने के लिए ही जीव शरीर को
त्‍यागने के बाद भी इस
मृत्‍यु लोक में रूहों और आत्‍माओं के रूप में भटकता रहता है। ऐसी रूहें
जिनके साथ कोई हादसा हुआ हो, हत्‍या हुयी हो, या फिर उन्‍होंने
आत्‍महत्‍या की हो। ये सारी आत्‍माएं परमात्‍मा की मर्जी से पहले ही अपना
शरीर छोड़ देती हैं, लेकिन उन्‍हे अपना समय पूरा करने के बाद ही
मृत्‍युलोक से मुक्‍ती मिलती है.

वत्सल वर्मा (freelancer journalist cum news
correspondent/Bureau Chief) Mob- 8542841018

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