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हर जगह होलिका दहन मत करें ............

Posted On: 24 Feb, 2015 Others में

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एक ओर आज हम ग्लोबल वार्मिंग जैसी भयानक स्थिति से निपटने के प्रयास ढूंढ
रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर हम इसकी परवाह किए बगैर लगातार पेड़ों की कटाई
करते हुए जंगल के जंगल तबाह कर रहे हैं। कुछ दिनों बाद होली का त्योहार
है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार होली खेलने के एक दिन पूर्व हम होली जलाते हैं
और उसमें लकड़‍ियों का प्रयोग करते हैं। इससे पर्यावरण तो दूषित होता ही
है, साथ ही कई क्विंटल लकड़ी जलकर स्वाहा हो जाती है और न जाने इस दिन
कितने पेड़ों की बलि चढ़ जाती है।
हिंदू धर्म में लकड़ी को जलाना पाप माना गया है। आज जिस प्रकार धीरे-धीरे
जंगल खत्म हो रहे हैं, यह चिंता का विषय है। होलिका दहन के लिए किसी भी
कीमत पर लकड़ी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। लोगों को चाहिए कि वह कंडे या
घर में पड़ी बेकार लकड़ी से होली जलाएं। होली हिंदुओं का त्योहार है। इसमें
हर रीति-रिवाज को पूरा करना एक मान्यता है, इसलिए होलिका का सिर्फ
प्रतीकात्मक दहन करते हुए पुरानी डलिया, घास व कंडे का प्रयोग करें। संभव
हो तो बड़ी होली न जलाते हुए छोटी जलाएं।
होली सौहार्दपूर्ण वातावरण में वैकल्पिक रूप से जलाना चाहिए। लकड़ी से
प्रदूषण अधिक होता है, इसलिए कंडे का प्रयोग करना चाहिए। इससे गंदगी भी
कम होगी, पेड़ बचेंगे और पर्यावरण प्रदूषित नहीं होगा।पर्यावरण को बचाना
हर एक नागरिक का कर्तव्य है। इसमें फिर भी कोई पेड़ की कटाई कर होलिका दहन
करता है तो वह संसार के साथ गद्दारी कर रहा है। हमें खराब आइटम से होलिका
दहन कर पर्यावरण को बचाना चाहिए .
वैसे ही हरियाली का अभाव हो रहा है। ऐसे में अगर हम होलिका दहन के लिए
लकड़ी काटते हैं तो आने वाले समय में हम हरियाली देखने को तरस जाएंगे।
लोगों को इसके बारे में गहन चिंतन की आवश्यकता है। होलिकादहन शहर में एक
से अधिक स्थानों पर होते है तथा इसके आयोजकों का प्रयास होता है कि उनकी
होली का आकार दूसरे की होली से बड़ा हो, इस प्रतिस्पर्द्धा में होलिकादहन
के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों को काट दिया जाता है। पर यदि हर चौराहे
पर होलिका दहन करने के बजाय शहर में एक जगह होलिकादहन किया जाए तो इससे
हमारी आस्था को भी ठेस नहीं लगेगी और पेड़ भी बच जाएंगे।होली के दिन लोग
जम कर रंग खेलते हैं और बाद में साबुन पानी की मदद से रंग छुड़ते हैं।
इसमें सामान्य से तीन गुना अधिक पानी खर्च होता है। जानकारों का मानना है
कि यदि हमने आज पानी की बर्बादी नहीं रोकी, तो हमारी भावी पीढ़ी होली का
मजा नहीं ले सकेंगी। होली के मौसम में पानी एक-दूसरे जरूर डालिए, पर
सीमित मात्रा में। देश में पानी की समस्या को देखते पानी बचाना बहुत
जरूरी है, इसलिए पानी बर्बाद मत करिए। होली खेलने के लिए प्राकृतिक रंगों
का प्रयोग करिए, इन्हें छुटाना आसान होता है। आप इको फ्रैंडली रंगों के
साथ सूखी होली खेल कर भी पानी की बचत कर सकते हैं। होली खेलने के लिए
गुब्बारों या प्लास्टिक की थैली का प्रयोग न करें, इससे दुर्घटना हो सकती
है तथासाथ ही इसके कारण सड़क में चारो तरफ प्लास्टिक का कचरा फैल जाता।
जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है।
एक सामाजिक पर्व होने के नाते यह किसी एक परिवार तक सीमित नहीं होता,
इसलिए होली के कारण हमारे पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचे,
इसकी जिम्मेदारी पूरे समाज पर आती है। इको फ्रैंडली होली का सपना तभी
पूरा हो सकता जब समाज का प्रत्येक वर्ग जो इसे मनाता है इसमें अपना सहयोग
दे। इसके लिए एक जन-जागरण अभियान की जरूरत है। लोगों को समझना होगा कि
उनके थोड़े से प्रयास का पर्यावरण पर कितना अनुकूल असर पड़ता है। एक बार
बात समझ में आने पर इस तरह के परिवर्तन के लिए उन्हें खुद को तैयार करना
आसान हो जाएगा। हमारे लिए इको फ्रैंडली होली का विचार नया हो सकता है, पर
अगर हम मथुरा-वृंदावन की होली देखें तो पाएंगे कि वहां होली गुलाल और
फूलों की पंखुड़ियों से ही खेली जाती है। और इससे उनके त्योहार के आनंद
में कोई कमी नहीं आती। वे ही नहीं वहां आने वाले विदेशी भी इस होली का
आनंद उठाते हैं। तो दोस्तो, इस बार पर्यावरण और अपने स्वास्थ्य की रक्षा
के लिए इको फ्रैंडली होली का आनंद उठाइए।

वत्सल वर्मा ,
Kanpur ( U.P.) Mob- 08542841018

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